Wednesday, February 20, 2019

पुलवामा हमले की पाकिस्तान ने निंदा तक नहीं कीः जेटली

पुलवामा हमले को लेकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के दावों को ख़ारिज करते हुए भारत के वित्त मंत्री अरूण जेटली ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने तो हमले की निंदा तक नहीं की है.

सबूत देने के मसले पर अरुण जेटली ने कहा, " जब अपराध करवाने वाला जब ये स्वीकार कर रहा है तो फिर ये अप्रत्यक्ष इंटेलिजेंस देने का क्या मतलब है. "

उन्होंने कहा," पाकिस्तान की धरती का प्रयोग इस आतंक के लिए किया गया है, जो पहले भी किया जाता रहा है. इसलिए पाकिस्तान का जो स्टैंड है उसकी पूरे विश्व में कोई विश्वसनीयता नहीं है."

इससे पहले इमरान ख़ान की बातों पर भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि जिस तरह से इमरान ख़ान ने हमले के पीछे पाकिस्तान की भूमिका से इनकार किया है, उसमें अचरज जैसी बात नहीं है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक पाकिस्तान हमेशा आतंकी हमले में किसी संलिप्ता से इनकार करता रहा है. मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने जैश-ए-मोहम्मद के दावे की भी उपेक्षा की है.

भारत के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद और उसके नेता मसूद अज़हर का ठिकाना पाकिस्तान में है और ये बात किसी से छुपी नहीं है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इस मामले पर भारत को सबूत देने को कहा ताकि जांच में मदद कर सके.

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक ये एक कमजोर बहाना है, क्योंकि 26 नवंबर, 2011 के मुंबई हमले के सबूत पाकिस्तान को देने के बाद भी दस साल बाद भी मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान को नया पाकिस्तान कहा है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में पूछा है कि नया पाकिस्तान कैसा पाकिस्तान है जिसमें मौजूदा सरकार के मंत्री हफ़ीज सईद जैसी आतंकी के साथ सार्वजनिक तौर पर प्लेटफ़ार्म शेयर करते हैं.

हालांकि भारत ने बातचीत के पहल के बारे में कहा कि भारत हमेशा विस्तृत द्विपक्षीय बातचीत के लिए तैयार है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पुलवामा हमले को भारत के आने वाले चुनाव से जोड़कर भी देखा था, जिसको भारतीय विदेश मंत्रालय ने बेहद दुखद बताया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बरगलाना बंद करे और पुलवामा हमले के दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करे जो विश्वसनीय हो और लोगों को नज़र भी आए.

जिस तरह पाकिस्तानी अपने मुल्क को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि बाक़ी दुनिया भी पाकिस्तान को वैसे ही देखे. इसी तरह जैसे हिन्दुस्तानी भारत को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि विदेशी भी भारत को इसी दृष्टि से देखें.

जनता की भावनाएं, मीडिया के एक्शन से भरपूर मांगें, नेताओं के मुंह से निकलने वाले झाग अपनी जगह, मगर सरकारों को किसी भी एक्शन या रिएक्शन से पहले दस तरह की और चीज़ें भी सोचनी पड़ती हैं.

अब पुलवामा के घातक हमले को ही ले लें. या इससे पहले पठानकोट और उड़ी की घटना या 2008 के मुंबई हमले या 1993 के मुंबई में दर्जन भर बम विस्फोटों से फैली बर्बादी. सबूत, ताना-बाना और ग़ुस्सा अपनी-अपनी जगह मगर इसके बाद क्या?

युद्ध होना होता तो 13 दिसंबर 2001 को हो जाना चाहिए था जब लोकसभा बिल्डिंग पर चरमपंथी हमला हुआ था.

दो दिन बाद रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से सेना को मार्चिंग ऑर्डर मिल चुके थे. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद पाकिस्तान से मिली सीमा पर भारतीय सेना की ये सबसे बड़ी तैनाती थी.

दोनों तरफ़ की फ़ौजें पंजाब से गुजरात तक एक दूसरे के दीदों में दीदें डाली घूरती रहीं और फिर 8000 करोड़ रुपये ख़र्च करने के बाद सेना डेढ़ वर्ष के बाद अगले मोर्चों से वापिस.

इस बार भी जब तक ग़ुस्सा ठंडा नहीं हो जाता तब तक चाहें तो सेना को एड़ियों पर खड़ा रखें. चुनाव में पुलवामा को मुद्दे के तौर पर पूरी तरीक़े से सब पार्टियां इस्तेमाल करें.

दोनों देश इस्लामाबाद और दिल्ली से लंबे समय के लिए राजदूत बुलवा लें. आर्थिक व सांस्कृतिक दौरे और तबादले रोक दें. एक-दूसरे के ख़िलाफ़ गुप्त कार्रवाईयां और तेज़ कर दें, मगर फिर- इसके बाद?

चीन हो या रूस या अमरीका या सऊदी अरब या यूरोपीय यूनियन- हर कोई बाक़ी संसार और उसकी मुश्किलों को अपने-अपने हिसाब से देखता है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती भी मोल-तोल में होती है और दुश्मनी भी गणित के हिसाब से होती है.

इस वक़्त अगर इलाक़े में अफ़ग़ानिस्तान को सुलटाने के लिए अमरीका को पाकिस्तान की ज़रूरत न होती तो अब तक ट्रंप साहब पुलवामा पर कम से कम पांच ट्वीट कर चुके होते.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ये मामला उठाया ज़रूर जा सकता है मगर चीन वीटो कर देगा. सऊदी अरब को जितनी भारत की ज़रूरत है उससे ज़्यादा सऊदी अरब को पाकिस्तान की.

ईरान और भारत मिलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई मोर्चा बना लें ऐसा नज़र नहीं आता.

क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए? दिल भले चाह रहा हो पर फ़िलहाल हालात इस क़ाबिल नहीं.

लेकिन, पुलवामा में जो बारूद इस्तेमाल हुआ वो सीमा पार से स्मगल हुआ? जिसने गाड़ी टकराई वो सीमा पार से आया? उसका हैंडलर लोकल था या सीमा की दूसरी तरफ़ बैठा था?

क्या कश्मीर में मिलिटेन्सी आज भी बाहर से कंट्रोल होती है या अब उसका अंदरूनी ढांचा बन चुका है?

और दहश्तगर्दी की भट्टी में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल बलूचिस्तान से कश्मीर तक मुसलसल क्यों पैदा हो रहा है?

इस पर कोई भी सरकार रोक क्यों नहीं लगा पा रही?

सब जानते हैं पर जवाब कौन देगा. दुश्मनी में सबसे पहली लाश सच्चाई की गिरती है- मानो कि ना मानो.

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